सम्राट अशोक
सम्राट अशोक के बारे में:
चक्रवर्ती सम्राट अशोक (ईसा पूर्व 273 से ईसा पूर्व 236) विश्वप्रसिद्ध एवं शक्तिशाली भारतीय मौर्य राजवंश के महान सम्राट थे। सम्राट अशोक का पूरा नाम देवानांप्रिय अशोक मौर्य (राजा प्रियदर्शी देवताओं का प्रिय) था। उनका राजकाल ईसा पूर्व २७३ से २३६ प्राचीन भारत में था। मौर्य राजवंश के चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने अखंड भारत पर राज्य किया है तथा उनका मौर्य साम्राज्य उत्तर में हिन्दुकुश की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बांग्लादेश से पश्चिम में अफ़ग़ानिस्तान, ईरान तक पहुँच गया था। सम्राट अशोक का साम्राज्य आज का संपूर्ण भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यान्मार के अधिकांश भूभाग पर था, यह विशाल साम्राज्य उस समय तक से आज तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य रहा है।
सम्राट अशोक का साम्राज्य:
सम्राट अशोक का इतिहास:
चंद्रगुप्त द्वारा राज्यपद का त्याग किए जाने के बाद उसका बेटा बिंदुसार मगध का राजा बना । बिंदुसार की मृत्यु के पश्चात उसका बेटा अशोक ईसा पूर्व २७३ में सत्तासीन हुआ । राजा बनने से पूर्व उसकी नियुक्ति तक्षशिला और उज्जयिनी के राज्यपाल के रूप में की गई थी । राज्यपाल के रूप में कार्य करते समय तक्षशिला में विद्रोह हुआ था और अशोक ने इस विद्रोह को सफलतापूर्वक दबाया था । मगध का सम्राट पद प्राप्त करने के पश्चात उसने कलिंग पर आक्रमण किया । कलिंग राज्य का प्रदेश वर्तमान ओडिशा राज्य में था ।
सम्राट अशोक ने कलिंग पर विजय प्राप्त की । सम्राट अशोक के राज्य का विस्तार पश्चिमोत्तर अफगानिस्तान तथा उत्तर दिशा में नेपाल से दक्षिण दिशा में कर्नाटक तथा आंध्र प्रदेश तक, पूर्व दिशा में बंगाल से पश्चिम में सौराष्ट्र तक था ।
कलिंग युद्ध ः ( ईस पूर्व २६१ में )
अशोक ने अपने शासन के 8वें वर्ष में कलिंग पर आक्रमण किया तथा उसे जीत लिया। कलिंग युद्ध में हुए रक्तपात को देखकर अशोक ने पुन: कभी भी युद्ध न करने का निश्चय किया । उसकी दृष्टि से सत्य, अहिंसा, दूसरों के प्रति दया और क्षमावृत्ति जैसे गुण महत्त्वपूर्ण थे । अशोक ने अपना संदेश लोगों तक पहुँचाने के लिए विभिन्न स्थानों पर शिलालेख और स्तंभ उकेरवाए । ये लेख ब्राह्मी लिपि में हैं। इन लेखों में उसने स्वयं का उल्लेख ‘देवानं पियो पियदसी’ (ईश्वर का प्रिय प्रियदर्शी) इस रूप में किया है । राज्याभिषेक होने के आठ वर्षों के पश्चात उसने कलिंग पर विजय प्राप्त की और वहाँ हुए संहार को देखकर उसका हृदय परिवर्तन हुआ; यह उल्लेख उसके एक लेखन में मिलता है ।
सम्राट अशोक के दिल्ली-टोपड़ा के एक लेख में चमगादड़, बंदर, गैंडा आदि का शिकार न करें, जंगल में आग न लगाऍं जैसे कठोर प्रतिबंध लिखकर रखे हुए थे।
अशोक का धर्म प्रसार कार्य :
अशोक ने स्वयं बौद्ध धर्म स्वीकार किया था । उसने पाटलिपुत्र में बौद्ध धर्म की तीसरी परिषद का आयोजन किया था । बौद्ध धर्म के प्रसार हेतु अशोक ने अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को श्रीलंका भेजा था । दक्षिण-पूर्व एशिया और मध्य एशिया के देशों में भी धर्मप्रसार हेतु बौद्ध भिक्षुओं को भेजा था । उसने अनेक स्तूपों और विहारों का निर्माण करवाया ।
अशोक के लोककल्याणकारी कार्य :
अशोक ने प्रजा को सुख-सुविधा उपलब्ध कराने पर बल दिया । जैसेलोगों को तथा पशुओं को नि:शुल्क औषधि मिले, ऐसी सुविधा उपलब्ध करवाई । अनेक सड़कों का निर्माण करवाया । छॉंव के लिए सड़कों के दोनों ओर पेड़ लगवाए । धर्मशालाओं का निर्माण करवाया । कुऍं खुदवाऍं ।
मौर्यकालीन राज्य प्रशासन :
मौर्य साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी । राज्य प्रशासन की सुविधा की दृष्टि से साम्राज्य के चार विभाग बनाए गए थे । प्रत्येक विभाग की स्वतंत्र राजधानी थी ।
१. पूर्व विभाग - तोशाली (ओडिशा),
२. पश्चिम विभाग - उज्जयिनी (मध्य प्रदेश),
३. दक्षिण विभाग - सुवर्णगिरि (कर्नाटक में कनकगिरि),
४. उत्तर विभाग - तक्षशिला(पाकिस्तान)
राज्य प्रशासन को लेकर राजा को सलाह देने के लिए मंत्रिपरिषद हुआ करती थी । विभिन्न स्तरों पर कार्य करने वाले अनेक अधिकारी थे । इन सभी का पर्यवेक्षण करने और शत्रु की गतिविधियों पर नजर रखने हेतु बहुत सक्षम गुप्तचर विभाग था ।
मौर्यकालीन जनजीवन :
मौर्य कालखंड में कृषि उत्पादन को बहुत महत्त्व था । कृषि के साथ-साथ व्यापार तथा अन्य उद्योग भी बहुत समृद्ध हुए थे । हस्तिदंत पर उकेरने का कार्य, कपड़ा बुनना और रँगना, धातुकार्य जैसे कई व्यवसाय चलते थे । चमकवाले काले रंग के मिट्टी के बरतन बनाए जाते थे । जलपोतों का निर्माण भी बड़ी मात्रा में चलने वाला उद्योग था ।धातुकार्य में अनेक धातुओं के साथ लोहे की वस्तुऍं बनाने की तकनीक विकसित हुई थी ।
नगरों और गॉंवों में तीज-त्योहार, उत्सव संपन्न होते थे । उनमें लोगों के मनोरंजन के लिए नृत्य-गायन के कार्यक्रम होते थे । दंगल, रथों की दौड़ लोकप्रिय खेल थे । पॉंसों के खेल और शतरंज जैसे खेल बड़ी रुचि से खेले जाते थे । शतरंज को ‘अष्टपद’ के नाम से जाना जाता था ।
मौर्यकालीन कला और साहित्य :
सम्राट अशोक के कार्यकाल में शिल्पकला को प्रोत्साहन मिला । अशोक द्वारा स्थापित स्तंभ भारतीय शिल्पकला के उत्तम नमूने हैं । उसके द्वारा निर्मित स्तंभों पर सिंह, हाथी और बैल जैसे पशुओं के अत्यंत उत्तम शिल्प हैं ।
1) स्तंभशीर्ष ( राजमुद्रा सारनाथ )
सारनाथ में निर्मित अशोक स्तंभ पर अंकित चक्र भारत के राष्ट्रध्वज पर दिखाई देता है । इस स्तंभ पर चारों ओर सिंह अंकित हैं । परंतु सामने से देखते समय उनमें से तीन सिंह ही दिखाई देते हैं । यह भारत की राजमुद्रा है ।
भारत की राजमुद्रा सारनाथ में निर्मित अशोक स्तंभ के आधार पर बनाई गई है । सारनाथ में निर्मित इस मूल स्तंभ पर चार सिंह हैं । प्रत्येक सिंह की प्रतिमा के नीचे आड़ी पट्टी पर चक्र है । उनमें से हमें एक ही चक्र पूरी तरह से दिखाई देता है । चक्र के एक ओर अश्व(घोड़ा) तथा दूसरी ओर वृषभ(बैल) अंकित हैं । राजमुद्रा की जो दिशा दिखाई नहीं देता; उस दिशा पर इसी भॉंति हाथी और सिंह अंकित हैं।
2) बराबार की गुफाऍं :
अंत में :
सम्राट अशोक की मृत्यु के पश्चात मौर्य साम्राज्य का ह्रास प्रारंभ हुआ । मौर्य कालखंड के बाद भारत में अनेक राज्य उदित हुए । कुछ साम्राज्यों का भी उदय हुआ । मौर्य साम्राज्य प्राचीन भारत का सब से विशाल साम्राज्य था ।
सम्राट अशोक के पश्चात मौर्य सत्ता की सामर्थ्य कम होती गई । अंतिम मौर्य नरेश का नाम बृहद्रथ था । मौर्य सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने विद्रोह करके बृहद्रथ की हत्या की और वह स्वयं राजा बन बैठा ।





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